Adivasidom Workshop  



आदिवासियत

समझदारी और साझाकरण



28 दिसंबर 2018 से 1 जनवरी 2019

नेतरहाट (झारखंड)

वंदना टेटे, ग्लैडसन डुंगडुंग, सुषमा असुर, रंजीत उरांव, दीपक बाड़ा, केएम सिंह मुंडा, एके पंकज और प्रशांत सिदाम के साथ पांच दिवसीय आवासीय कार्यशाला.

इस कार्यक्रम का उद्देश्य आदिवासी दर्शन और सौंदर्यबोध यानी आदिवासियत को जानने, समझने और समुदाय के साथ, विशेषकर युवाओं और नई पीढ़ी के साथ साझा करना है। इस कार्यक्रम की परिकल्पना एक पांच दिवसीय आवासीय शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यशाला के रूप में की गई है। जिसमें प्रतिभागी और प्रशिक्षक दोनों ही समुदाय और प्रकृति के सान्निध्य में एक-दूसरे से अपने ज्ञान और अनुभवों को साझा करेंगे। इस कार्यक्रम के मुख्य पहलु हैं - आदिवासी जीवन क्या है और यह खुद के साथ-साथ सृष्टि के तमाम तत्वों को किस रूप में देखता है, उनके साथ किस तरह से व्यवहार करता है, आपसी संबंधों और सहअस्तित्व को किस तरह से व्याख्यायित करता है।

कार्यशाला विवरण

Adivasidom Workshop

कार्यक्रम

कार्यशाला हेतु रांची रिपोर्टिंग :
27 दिसंबर 2018 को किसी भी समय

स्वागत सम्मिलन :
संध्या 7 बजे, 27 दिसंबर 2018

पहला दिन : 28 दिसंबर 2018
नेतरहाट के लिए रवानगी : सुबह 5 बजे

रास्ते में अवलोकन :
1. उरांव धार्मिक स्थल, मुड़मा
2. शहीद बुदु भगत स्मारक, सिलागाईं
3. लोहरदग्गा, झारखंड का प्राचीन शहर
4. दोपहर का खाना: घाघरा

दूसरा दिन : 29 दिसंबर 2018
आदिवासियत क्या है
(वाचिक/लिखित इतिहास के संदर्भ में)

आदिवासी जीवनशैली
(भाषा और संस्कृति के संदर्भ में)

तीसरा दिन : 30 दिसंबर 2018
आदिवासियत और भारतीय राजनीति
(संवैधानिक लोकतंत्र के संदर्भ में)

आदिवासियत का भविष्य
(नई दुनिया की चुनौतियों के संबंध में)

चौथा दिन : 31 दिसंबर 2009
तमाड़ के लिए प्रस्थान : सुबह 7 बजे

रास्ते में अवलोकन :
1. एराउज आदिवासी संग्रहालय, गुमला
2. डोईंसागढ़, मुंडा ऐतिहासिक स्थल
3. रात्रि विश्राम: बारुडीह गांव, तमाड़

पांचवां  दिन : 1 जनवरी 2019
रांची के लिए प्रस्थान : सुबह 5 बजे

रास्ते में अवलोकन :
1. प्राचीन पत्थलगड़ी स्थल, चोकहातु
2. दासोंग झरना, बुंडू
3. उलिहातु, बिरसा मुंडा जन्म स्थल

विदाई सम्मिलन : रात्रि 8 बजे

Adivasidom Workshop

आवेदन की प्रक्रिया

इस आवासीय कार्यशाला की परिकल्पना सिर्फ 15 प्रतिभागियों को ध्यान में रख कर की गई है। प्रतिभागियों का चुनाव उनके आवेदनों के आधार पर किया जाएगा। कार्यशाला में शामिल होने के लिए कोई भी आवेदन कर सकता है। आवेदन 15 नवंबर 2018 की शाम 6 बजे तक ऑनलाइन स्वीकार किए जाएंगे। इस निर्धारित समय सीमा के बाद प्राप्त होने वाले आवेदनों पर विचार नहीं किया जाएगा। आवेदन शुल्क मात्र 100 रुपया है जो अप्रतिदेय है।

योग्यता :
1. आवेदक को 18 से 40 वर्ष की उम्र के बीच होना चाहिए।
2. आवेदक को भारतीय आदिवासी होना चाहिए। विदेशी और गैर-भारतीय आदिवासी आवेदन नहीं कर सकते हैं।

आवेदन की प्रक्रिया :
चरण-1: ऑनलाइन आवेदन
चरण-2: चयनित प्रतिभागियों को सूचना 20 नवंबर को ईमेल द्वारा दी जाएगी।
चरण-3: चयन की सूचना मिलने के एक सप्ताह के भीतर चयनित प्रतिभागियों को अपना विस्तृत परिचय, नवीनतम फोटो और भेजी गई प्रश्नावली का जवाब निर्धारित शुल्क के साथ जमा करना होगा।

कृपया ध्यान रखें :
- प्रतिभागी शुल्क 3000 रुपये है जिसमें कार्यशाला के दौरान आवास, भोजन और यात्रा की लागत शामिल है।
- चयनित प्रतिभागियों को कार्यशाला की तिथियों को ध्यान में रखते हुए अपने रांची आने-जाने का पूरा विवरण तुरंत उपलब्ध करा देना अनिवार्य होगा।
- अधूरे और शुल्क रहित आवेदन स्वतः रद्द माने जाएंगे।

रद्द करने की नीति :
अंतिम पल में रद्दीकरण करने पर जमा राशि में से 25% जब्त कर ली जाएगी।

कार्यशाला से संबंधित किसी भी अन्य सवाल के लिए कृपया संपर्क करें: toakhra@gmail.com

Adivasidom Workshop

सीखने के उपकरण

हमने इस कार्यशाला की परिकल्पना कुछ इस तरह से की है जिससे कि प्रतिभागी बहुस्तरीय ढंग से सीखने और साझा करने का आनंद ले सकें। जैसा कि वास्तव में आदिवासी परंपरा रही है। आदिवासी ज्ञान परंपरा में प्रकृति, स्थानीय भूगोल और समुदाय का सर्वोच्च महत्त्व है। इन सभी तत्त्वों को कार्यशाला के केंद्र में रखा गया है और इसके साथ ही झारखंड के आदिवासी धर्म, इतिहास व अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों के भ्रमण को कार्यशाला के पाठ्यक्रम में प्रमुखता दी गई है।

1. प्रकृति
2. भूगोल और संस्कृति
3. समुदाय
4. वाचिक परंपरा
5. इतिहास
6. भाषाई-सांस्कृतिक तत्त्व
7. अनुभवी अगुआ
8. यात्राएं
9. आधुनिक स्रोत
(किताबें, संग्रहालय, इंटरनेट और मल्टीमीडिया के दूसरे माध्यम)
10. सहभागिता और अंतःक्रिया

कार्यशाला स्थल :
नेतरहाट झारखंड की राजधानी रांची से 156 किमी पश्चिम में स्थित है जो अब लातेहार जिले में आता है। समुद तल से 3700 फीट की उंचाई पर बसा नेतरहाट मुख्यतः असुर आदिम जनजाति समुदाय का पारंपरिक निवास क्षेत्र है। इन असुर लोगों ने ही लोहे की खोज की जिसके सहारे आज की दुनिया विकास के इस सोपान तक पहुंची है। औपनिवेशिक दिनों में अंग्रेजों ने इसकी प्राकृतिक खूबबसूरती के कारण इसे अपने पर्यटन का केंद्र बनाया। गैर-आदिवासी लोगों नेतरहाट को ‘छोटानागपुरी की रानी’ कहते हैं।


खोज ज्ञान की नहीं, बौद्धिकता की करो। ज्ञान तो अतीत का हिस्सा है जबकि बौद्धिकता भविष्य है।